Saturday, July 15, 2017

आशाएं




धुप्प अँधेरे में
गिरती बिजलियों की रौशनी में
माचिस पा जाता  कोई हाथ .

कमरे में सुबह सवेरे
पंख फड़फड़ाते मिलती
छिपकलियों के चंगुल से सही सलामत बच निकली  एक   तितली

भूखी कमजोर और आश्रयहीन
लेकि भीख मांग- मांग कर जी जाती
स्टेशन के चौराहे पर ,एक वृद्धा.

सालों साल किताबों से जूझता , तानों  से टूटता
लेकिन अंततः  एक दिन
अख़बार के एक कोने में  नजर आ जाता  एक सफल लड़का

'स्व' तक सीमित और दिखावे वाले महानगर में भी
बेहोशी  आ जाने पर अपने सहयात्री को पानी दे देता
कोई अनजान शख्स  .

9 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 16 जुलाई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. अच्छाइयाँ अभी खत्म नहीं हुईं पूरी तरह ! सकारात्मक सोच को नई दिशा देती रचना ।

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. सकारात्मकता को तलाशते सुन्दर चित्र पेश हुए हैं रचना में और बन गया एक यथार्थवादी शब्दचित्र। वाह ... लिखते रहिये।

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  5. सकारात्मकता को तलाशते सुन्दर चित्र पेश हुए हैं रचना में और बन गया एक यथार्थवादी शब्दचित्र। वाह ... लिखते रहिये।

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