Saturday, July 15, 2017

आशाएं




धुप्प अँधेरे में
गिरती बिजलियों की रौशनी में
माचिस पा जाता  कोई हाथ .

कमरे में सुबह सवेरे
पंख फड़फड़ाते मिलती
छिपकलियों के चंगुल से सही सलामत बच निकली  एक   तितली

भूखी कमजोर और आश्रयहीन
लेकि भीख मांग- मांग कर जी जाती
स्टेशन के चौराहे पर ,एक वृद्धा.

सालों साल किताबों से जूझता , तानों  से टूटता
लेकिन अंततः  एक दिन
अख़बार के एक कोने में  नजर आ जाता  एक सफल लड़का

'स्व' तक सीमित और दिखावे वाले महानगर में भी
बेहोशी  आ जाने पर अपने सहयात्री को पानी दे देता
कोई अनजान शख्स  .