Saturday, July 15, 2017

आशाएं




धुप्प अँधेरे में
गिरती बिजलियों की रौशनी में
माचिस पा जाता  कोई हाथ .

कमरे में सुबह सवेरे
पंख फड़फड़ाते मिलती
छिपकलियों के चंगुल से सही सलामत बच निकली  एक   तितली

भूखी कमजोर और आश्रयहीन
लेकि भीख मांग- मांग कर जी जाती
स्टेशन के चौराहे पर ,एक वृद्धा.

सालों साल किताबों से जूझता , तानों  से टूटता
लेकिन अंततः  एक दिन
अख़बार के एक कोने में  नजर आ जाता  एक सफल लड़का

'स्व' तक सीमित और दिखावे वाले महानगर में भी
बेहोशी  आ जाने पर अपने सहयात्री को पानी दे देता
कोई अनजान शख्स  .

Wednesday, December 21, 2016

भेड़चाल




‘जन गण मन’ में
खड़े रहे जो,
‘जन’ को देख पाते हें.
सड़क किनारे भीख माँगते,
रग्घू फिर मर जाते हें.

गाने और निभाने में है,
फ़र्क हमेशा होता.
गंगा -मैली करके वो जो
विन्ध्य हिमाचल गाते हें.
जन गण मन में
खड़े रहे जो
‘जन’ को देख पाते हें.

 जाति धर्म की तीखी बाढें,
जन के बीच चढ़ा दीं,
लोगों में फिर नफ़रत भरके
‘तव जय गाथा’ गाते हें,
‘जन गण मन’ में
खड़े रहे जो
‘जन’ को देख पाते हें

Sunday, December 27, 2015

रोटी

               रोटी

अपाहिज जग्गू ने, हरी मिर्च के नमक के साथ खाई.
कल्लू की मां ने, मीठे सफेद  प्याज के साथ खाई.
फटी शॉल से जांघें छिपाती-
पागल औरत ने ,दाल में सान के खाई.

नक्सली ने अधकच्ची खाई.
पुलिसवाले ने हड़बड़ी में खाई.
नेता ने दलित के घर-
 मीडीया को बुला -बुला के खाई.


नेता चॅनेल को इंटरव्यू देने लगा.
 पुलिसवाला ट्रॅफिक कंट्रोल में जुट गया.
 नक्सली धीरे से  चहलकदमी करने लगे.
पागल औरत को फिर से कोई वहशी घूरने लगा.
कल्लू की माँ पानी लाने चल दी,
अपाहिज जग्गू व्हील चेयर घिसते हुए-
गली की ओर बढ़ने लगा.






Friday, June 19, 2015

घराट वक़्त और प्यार

उसे लगा
वो फिर आएगी
घराट पर,
आटा पिसवाने
मड़ुए का।

वो इंतज़ार
करता रहा
उस जगह,
जहाँ पहले कभी-
वो मड़ुए की पिसती चटख़नों
और गिरते पानी के
 तड़ तड़ के बीच,
एक दूसरे से
नज़रें मिला लिया करते थे।


वो इंतज़ार
करता रहा
उस जगह,
जहाँ पहले कभी
घराट हुआ करता था।

Wednesday, February 12, 2014

" भारत भाग्य... "



बोला था -
घर घर जाओ,
जाकर हाल पूछते आओ .

दो दिन में, दस गाँवों का
तुम  सर्वे करके लाए हो ,
सच सच बोलो, क्या फिर से
सिर्फ़ सरपंच से मिलके आए हो?

कितने भूखे हैं,
कितने लाचार .
वो शख्स समझ कहाँ पाया है ?
जो जातिवाद के चश्मे से इंसान नापता आया है.

बोला था-
हर चूल्‍हे के हर हाल को.
बेरोज़गारी के हर जाल को,
क़ैद कर लो, इन फार्मों में.

इनसे ,भारत निर्माण की 
तस्वीरें  बनेगी ,
देश बनेगा ,
तक़दीरें बनेंगी 

सच बोलो ! ये आँकड़े -
क्या खुद से भरकर आए हो?
सच सच बोलो ,क्या फिर से-
सिर्फ़ सरपंच से मिलकर आए हो?

Thursday, January 23, 2014

आवेश में हूँ .


तेरह बूढ़ों की नसों में
रेंगता रहा लहू,
और एक आदिवासी लड़की
की चीख पुकार,
दब गयी
उनके सामूहिक शोर शराबे में .

कोई बताए कि क्यों,
इन बूढ़े ठरकी लोगों को,
 बैठा दिया जाता है,
पारंपरिक पंचायतों में ?

और कैसे बन जाती हैं,
ऐसी वहशी  योजनायें,
इन बूड़ी जर्जर पंचायतों में?
जो आज तक
स्कूल की टूटी चारदीवारी
सही नहीं करवा पाईं.

कोई बताए कि क्यों
'कम्युनिटी पोलिसिंग'  के नाम पर
सही वक़्त पर,
पोलीस के हाथ में
आ जाता है ठेंगा?

और औरतें,
जिन्हें अमूमन पता होता है
मुहल्ले में पक रही खिचड़ी का,
क्यों बेख़बर रहती हैं,
इस खबर से
कि कंगारू पंचायत
ने एक आदिवासी लड़की
के साथ सामूहिक बलात्कार
का फरमान सुनाया है?



Sunday, January 19, 2014

पार्क में


टूटी बेंच के नीचे,
पड़े मूँगफली के
दबे कुचले
छिलके की तरह .
अकेला बैठा  इंसान
यहाँ अक्सर सोचता है
कुछ ऐसा-
जो ना सोचे भी तो
कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.